सोशल मीडिया से लेकर दूसरे प्लेटफॉर्म्स तक अब AI कंटेंट पर सरकार कसने जा रही शिकंजा,जानें क्या है नया नियम

AI content rules India : भारत सरकार ने सोशल मीडिया पर तेजी से बढ़ते AI-जनरेटेड और डीपफेक कंटेंट पर सख्ती करते हुए बड़ा नियामकीय कदम उठाया है. इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने मंगलवार को सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 में संशोधन की अधिसूचना जारी की. संशोधित नियम 20 फरवरी से लागू होंगे. सरकार का कहना है कि इन बदलावों का उद्देश्य ऑनलाइन फैल रहे फर्जी वीडियो-फोटो, भ्रामक ऑडियो क्लिप और चुनावी धांधली जैसी गतिविधियों पर रोक लगाना है. पिछले कुछ समय में नेताओं के नकली बयान, आम नागरिकों के डीपफेक वीडियो और संवेदनशील घटनाओं से जुड़े फर्जी विजुअल तेजी से वायरल हुए हैं, जिससे गलत सूचना और सामाजिक अस्थिरता का खतरा बढ़ा है.

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर नई जिम्मेदारी

इन नए नियमों का दायरा बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे X (पूर्व में ट्विटर), YouTube, Snapchat और Facebook पर लागू होगा. सरकार ने स्पष्ट किया है कि अब इन कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म पर साझा किए जाने वाले AI-जनरेटेड कंटेंट की स्पष्ट पहचान सुनिश्चित करनी होगी. यदि कोई प्लेटफॉर्म नियमों का पालन नहीं करता, तो उसे आईटी अधिनियम के तहत मिलने वाली सेफ हार्बर यानी कानूनी सुरक्षा से वंचित किया जा सकता है.

AI कंटेंट पर लेबलिंग अनिवार्य

संशोधित नियमों के अनुसार

  • किसी भी AI-जनरेटेड विजुअल (फोटो/वीडियो फ्रेम) के कम से कम 10% हिस्से में स्पष्ट लेबलिंग अनिवार्य होगी.
  • ऑडियो और वीडियो क्लिप में भी 10% हिस्से में यह दर्शाया जाना जरूरी होगा कि कंटेंट AI से निर्मित है.
  • लेबल ऐसा होना चाहिए जिसे आम उपयोगकर्ता आसानी से देख और समझ सके.
  • सरकार का तर्क है कि इससे यूजर्स को यह जानने में मदद मिलेगी कि जो कंटेंट वे देख रहे हैं, वह वास्तविक है या कृत्रिम रूप से तैयार किया गया है.

डीपफेक पर 3 घंटे में कार्रवाई

सबसे महत्वपूर्ण बदलावों में से एक है समय सीमा में कटौती. पहले भ्रामक या अवैध कंटेंट हटाने के लिए 36 घंटे का प्रावधान था, जिसे घटाकर अब 3 घंटे कर दिया गया है. यदि किसी प्लेटफॉर्म को यह पता चलता है कि कोई डीपफेक या भ्रामक AI कंटेंट फैल रहा है, तो उसे तीन घंटे के भीतर हटाना होगा. देरी की स्थिति में कंपनी की सीधी जवाबदेही तय की जाएगी.

यूजर्स पर भी जिम्मेदारी

नए नियम केवल कंपनियों तक सीमित नहीं हैं और अब किसी भी पोस्ट को अपलोड करते समय यूजर को यह बताना होगा कि कंटेंट AI-जनरेटेड है या नहीं. प्लेटफॉर्म्स को तकनीकी सत्यापन टूल्स का उपयोग करना होगा ताकि यूजर द्वारा दी गई जानकारी की पुष्टि की जा सके. हर तीन महीने में यूजर्स को नियम उल्लंघन से जुड़ी संभावित पेनाल्टी के बारे में रिमाइंडर भेजना अनिवार्य होगा. सरकार का कहना है कि यह साझा जिम्मेदारी मॉडल होगा, जिसमें प्लेटफॉर्म और यूजर दोनों की जवाबदेही तय होगी.

संवेदनशील कंटेंट पर सख्ती

नियमों में बच्चों से जुड़े कंटेंट, निजी तस्वीरों, बिना सहमति के बनाए गए विजुअल, फर्जी दस्तावेज और हिंसा दर्शाने वाले AI कंटेंट पर विशेष सख्ती की बात कही गई है. ऐसे मामलों में प्लेटफॉर्म को शिकायत का इंतजार किए बिना स्वतः कार्रवाई करनी होगी. विशेषज्ञों का मानना है कि चुनावी प्रक्रिया के दौरान डीपफेक और भ्रामक AI कंटेंट का खतरा बढ़ जाता है. सरकार का दावा है कि नए नियम चुनावी पारदर्शिता बनाए रखने और गलत सूचना पर लगाम लगाने में मदद करेंगे. हालांकि, कुछ डिजिटल अधिकार समूहों ने यह भी चिंता जताई है कि अत्यधिक नियमन से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और रचनात्मक प्रयोग प्रभावित हो सकते हैं.

अब आगे क्या

22 अक्टूबर 2025 को जारी ड्राफ्ट के बाद विभिन्न हितधारकों से सुझाव लिए गए थे. अब अधिसूचना जारी होने के साथ ही 20 फरवरी से ये नियम प्रभावी हो जाएंगे. सरकार का कहना है कि AI तकनीक का उपयोग विकास और नवाचार के लिए होना चाहिए, न कि धोखाधड़ी या भ्रम फैलाने के लिए. स्पष्ट है कि इंटरनेट पर जो दिख रहा है वही सच है का दौर खत्म हो रहा है. अब AI-जनरेटेड कंटेंट को पहचान के साथ साझा करना अनिवार्य होगा, और सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी पहले से कहीं अधिक बढ़ जाएगी.

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