Suicide cases in India : दुनिया आज जिस सबसे डरावनी और खामोश महामारी से जूझ रही है, उसका नाम है आत्महत्या. यह कोई बीमारी नहीं, बल्कि एक ऐसा सामाजिक और मानसिक संकट है, जो हर 40 सेकंड में एक इंसानी ज़िंदगी छीन रहा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, दुनिया भर में हर साल 7 लाख से ज्यादा लोग आत्महत्या कर अपनी जिंदगी खत्म कर लेते हैं. यह आंकड़ा केवल एक संख्या नहीं, बल्कि 7 लाख टूटे हुए परिवारों, उजड़े सपनों और समय पर न मिली मदद की कहानी है.
युवा सबसे ज्यादा शिकार
WHO के विश्लेषण में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि 15 से 29 वर्ष के युवा आत्महत्या से मरने वालों में सबसे बड़ा वर्ग हैं. जिस उम्र में जीवन अपने शिखर की ओर बढ़ता है, उसी उम्र में हज़ारों युवा अवसाद, असफलता, सामाजिक दबाव और अकेलेपन से हार मान रहे हैं. विशेषज्ञ मानते हैं कि आज की युवा पीढ़ी पर करियर का अत्यधिक दबाव, सोशल मीडिया की तुलना की होड़ , रिश्तों में अस्थिरता, आर्थिक असुरक्षा और साइबर उत्पीड़न जैसे बड़े कारक मानसिक रूप से गहरा असर डाल रहे हैं जिसके कारण लोग ऐसा कदम उठा लेते हैं.
भारत में हालात तो और भी गंभीर
भारत में आत्महत्या की तस्वीर वैश्विक औसत से कहीं ज्यादा भयावह है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, देश में हर साल 1.7 लाख से अधिक लोग आत्महत्या कर रहे हैं. यह संख्या दुनिया के किसी भी एक देश में सबसे ज्यादा है. भारत में आत्महत्या के पीछे कई जटिल कारण सामने आते हैं जिसमें बेरोज़गारी और आर्थिक तंगी, पारिवारिक विवाद, प्रेम संबंधों में असफलता, परीक्षा में असफलता,कर्ज़ का बोझ,खेती में नुकसान,मानसिक बीमारी का इलाज न मिलना,नशे की लत और तेजी से बढ़ता डिजिटल उत्पीड़न व ब्लैकमेलिंग प्रमुख कारण है.
भारत में आत्महत्या की क्या है बड़ी वजह
इसके अलावा बीते कुछ वर्षों में देश में लीक फोटो, वायरल वीडियो, फर्जी अकाउंट और ऑनलाइन ब्लैकमेलिंग के कारण युवाओं की आत्महत्या के कई मामले सामने आए हैं. हालांकि NCRB अब तक इस कारण को अलग श्रेणी में दर्ज नहीं करता, लेकिन पुलिस रिकॉर्ड और मीडिया रिपोर्ट्स में यह एक नया और बेहद खतरनाक ट्रेंड बनकर उभर रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि सोशल मीडिया पर बदनामी का डर, परिवार की इज्ज़त का दबाव और समाज का डर युवाओं को चुपचाप मौत की ओर धकेल देता है.
भारत में आत्महत्या के मामलों में जो तीन वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित हैं उसमे पहले नंबर पर हैं किसान. खेती में घाटा, कर्ज़ और मौसम की मार किसानों को लगातार आत्महत्या की ओर धकेल रहे हैं. दुसरे नंबर पर हैं छात्र. परीक्षा का दबाव, प्रतियोगिता, फेल होने का डर और करियर की अनिश्चितता छात्रों को अवसाद में डाल रही है और वो यह कदम उठा ले रहे. घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न, सामाजिक दबाव और रिश्तों में शोषण महिलाओं में आत्महत्या के मामलों को बढ़ा रहे हैं. जो लिस्ट में तीसरे नंबर पर है.
WHO की चेतावनी
WHO का साफ कहना है कि आत्महत्या केवल मानसिक रोग नहीं है बल्कि यह एक सामाजिक और सरकारी व्यवस्था की विफलता है. दुनिया के 75% आत्महत्या मामले निम्न और मध्यम आय वाले देशों में होते हैं. यानि जहां इलाज, काउंसलिंग और सामाजिक सुरक्षा कमजोर है, वहां मौतें ज्यादा हैं. WHO और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, अगर समय रहते मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं सस्ती और सुलभ हों, स्कूल-कॉलेजों में काउंसलिंग अनिवार्य हो, सोशल मीडिया अपराधों पर सख्त कार्रवाई हो, परिवारों में संवाद की संस्कृति मजबूत हो और मानसिक बीमारी को पागलपन नहीं, इलाज योग्य बीमारी समझा जाए तो आत्महत्या को रोका जा सकता है.