Maithili Ram : भारत की सभ्यता और संस्कृति का अगर मानवीकरण करें और इतिहास को खंगालें तो जो एक उपमा तैयार किया जा सकता है. उसकी शक्ल हूबहू महाकाव्य रामयाण के मुख्य पात्र मर्यादा पुरुषोत्तम राम से मिलती है.मेरे आपके तर्क भिन्न हो सकते हैं लेकिन इसकी तथ्यात्मक अध्ययन ऐसी गुंजाइश की संभावना को खत्म कर देती है. रामायण की कहानी कहिए या फिर राम कथा… यह भारत की वो कहानी है…जहां मर्यादा न सिर्फ महत्वपूर्ण है बल्कि यह प्राथमिक भी है और प्रासंगिक भी. जिसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि आज भी राम कथा में कई तरह की विचारों का समावेश देखने को मिलता है जिसे आज भी उद्हारण के तौर पर पेश किया जाता है.
कितनी हैरान करने वाली बात है कि हम जिस कथा की बता कर रहें है इसकी उत्पत्ति का कोई अधिकारिक आँकड़ा नहीं है… मतलब राम शब्द की उत्पत्ति कब हुई…इसको लेकर कई तर्क हैं…लेकिन माना जाता है कि राम नाम का पहला जिक्र ऋग्वेद में आया है. जहां राम का नाम एक यज्ञ के कुछ यजमान राजाओं के साथ लिखा गया है. हालांकि ये भगवान राम ही हैं, ऐसा कहीं जिक्र नहीं है, लेकिन इतिहासकार और धर्म ज्ञाता इस बात पर एक हो जाते है कि राम नाम रामायण के राम जन्म से पहले से है. वेदों से लेकर ब्राह्मण संहिताओं तक में राम का जिक्र आता है. अलग-अलग अर्थों में ही लेकिन राम नाम वैदिक काल से है.
भारत के ही कई हिस्सों में रामायण की ना सिर्फ अलग-अलग कहानी है बल्कि मान्यता है… भारत में कुल 300 से ज़्यादा प्रकार की रामायण पढ़ी और सुनी जाती हैं. जो राम की कहानी तो है लेकिन इसमें राम कथा से जुड़ी 2 से 3 हजार लोक कथाएं भी हैं. पूरे विश्व में भारत के अलावा 9 और देश हैं जहां किसी ना किसी रुप में 50 से ज्यादा भाषा और 400 से ज्यादा रामकथा पढ़ी, सुनी और गाई जाती है. इन 300 से ज़्यादा प्रकार की रामायण में सबसे प्रमुख 24,000 श्लोकों और सात कांडों में विभाजित वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण और तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस है. दुनिया भर के दूसरे भाषा के कई लेखकों ने भी अपनी लेखनी को अमर करने के लिए रमायण का रेफरेंस लिया है.
इन सबके बीच जो ज्यादा महत्वपूर्ण वो रामायण से जुड़ी लोककथाएं…आपको हैरानी होगी की रामायण ही अकेली कहानी है जो अलग-अलग तरह से पढ़ी और कही तो जाती ही है लेकिन इसके साथ-साथ इस पर सबसे ज्यादा लोककथाएं भी लिखी गई हैं. राम के जीवन काल का एक प्रमुख हिस्सा यात्रा से जुड़ा है…राम की इस यात्रा में एक पड़ाव है मिथिला, जहां अपने गुरु विश्वामित्र के साथ राम ने 13 वर्ष की आयु में अयोध्या से मिथिला की सीमा तक करीब 3 महीने का समय गुजारा. इस दौरान राम ने अयोध्या से चलने के बाद जनकपुर पहुंचने तक बिहार में लगभग साढ़े तीन सौ किलोमीटर की यात्रा की थी.सीता स्वयंवर और उसके बाद के समय को जोड़ दें तो करीब डेढ़ महीने तक राम मिथिला में रहे थे.
रामायण की लोककथाओं और धार्मिक आख्यानों में कई कहानी को लोकप्रियता का मुकाम मिला है, लेकिन यदि किसी प्रसंग ने विशेष स्थान प्राप्त किया है तो वह है राम विवाह. यह प्रसंग न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी इसकी गूंज जीवित है. जिसके तर्ज पर हर वर्ष मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को “विवाह पंचमी” के रूप में मनाया जाता है. लोक मान्यता है कि इसी दिन भगवान राम और माता सीता का विवाह हुआ था. आज यह पर्व न केवल धार्मिक अनुष्ठानों का अवसर है,बल्कि यह अवध (अयोध्या) और मिथिला (वर्तमान बिहार का उत्तरी क्षेत्र और नेपाल का जनकपुर) की साझा सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने का माध्यम भी है.
इस मान्यता को अवध और मिथिला के लोगों ने इस तरह जीवित कर दिया है कि मानो शादी राम और सीता की नहीं बल्कि उनके अपनी सगी बेटी की हो. इस दिन अयोध्या और जनकपुर समेत मिथिलांचल के अनेक गांवों और नगरों में राम-सीता विवाह की रस्में निभाई जाती हैं. मंदिरों में बारात सजाई जाती है, पारंपरिक गीत गाए जाते हैं और राम को दूल्हे तथा सीता को वधू के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. हजारों साल पहले घटी इस घटना को जीवित स्वरूप देकर आज भी लोग यह साबित करते है कि विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि दो संस्कृतियों का संगम होता है, जैसा हजारों साल पहले अयोध्या की मर्यादा और मिथिला की ममता का मिलन हुआ था….
राम की असल मर्यादा मिथिला में अपनी शादी के दौरान और इसके बाद के परंपरा के निर्वाहन में देखने को मिलता है,जहां राम अपनी सहनशीलता को भी प्रदर्शित करते है. दरअसल, मिथिलांचल की सांस्कृतिक परंपरा में दामाद को ‘पाहुन’ कहा जाता है और सीता से शादी के कारण राम मिथिला के दामाद है. तो मिथिला के लोगों का राम जैसे पाहुन के प्रति सम्मान,प्रेम और अपनत्व की पराकाष्ठा राम के प्रसंग में देखने को मिलती है. जहां राम को केवल राजा या ईश्वर नहीं बल्कि अपने घर के सदस्य के रूप में देखा गया है. मैथिली में एक लोक गीत है…जो शादी विवाह के अवसर पर यह खुब गाया और सुना जाता है.
” राम जी पहुनमा भेलखिन मोर हे मिथिला के नाते…
जनक किशोरी मोरी भेलखिन बहिनिया हे मिथिला के नाते…”
मिथिला में राम को गाली देने की एक अनोखी परंपरा भी है, जो बाहरी व्यक्ति को अजीब लग सकती है, परंतु यह गाली नहीं स्नेह का प्रतीक होती है. “पाहुन गारी” के माध्यम से मिथिला की स्त्रियाँ राम को छेड़ती हैं, उनसे संवाद करती हैं, मानो वह कोई अत्यंत आत्मीय संबंध हो. यह परंपरा एक तरह से स्त्री की भावनात्मक अभिव्यक्ति है जहाँ वह बिना किसी संकोच के किसी गैर पुरुष से संवाद कर सकती है. लोकगीतों में यह परंपरा जीवंत है, और राम को लेकर गीतों में ठिठोली, उलाहना और प्रेमभाव का अनूठा संगम दिखाई देता है. मैथलानी राम से ठिठोली करते हुए पुछती हैं….
”राम जी से पूछे जनकपुर की नारी,
बता दा बबुआ लोगवा देत कहे गारी…”
एक तरफ जहां राम और सीता का विवाह भारतीय समाज में आदर्श दांपत्य जीवन का प्रतीक माना गया है, जहाँ प्रेम, समर्पण, त्याग और मर्यादा का अद्भुत संतुलन है. मिथिला और भारत के अन्य कुछ क्षेत्रों में इस विवाह को दुखद परिणति वाला मिलन भी माना जाता है जहां इस दिन कोई अपने बेटी की शादी नहीं करता. इसके पीछे यह धारणा है कि राम और सीता का जीवन कष्टों से भरा रहा, विवाह के तुरंत बाद राम को वनवास मिला, सीता को अनेक कष्ट सहने पड़े, और अंततः गर्भावस्था में राम ने उनका त्याग कर दिया. इसलिए कुछ लोगों की दृष्टि में यह विवाह एक त्रासदी की शुरुआत भी था.
मिथिला की माटी में राम रचे-बसे हैं. यहां के लोकगीत, विवाह गीत, पर्व, चित्रकला आदि हर क्षेत्र में राम एक भावनात्मक उपस्थिति हैं. मिथिला पेंटिंग में राम और सीता के विवाह को बार-बार चित्रित किया जाता है. इन चित्रों में जनक के महल में राम को हाथ जोड़कर खड़े हुए दामाद के रूप में दिखाया जाता है जो मिथिला की संस्कारशीलता और पारिवारिक गरिमा का प्रतीक है. जहाँ अन्य क्षेत्रों में राम को ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ के रूप में पूजा जाता है, वहीं मिथिला में राम की छवि अधिक मानवीय और आत्मीय है. वे यहाँ कोई परदेसी नहीं, बल्कि उसके अपने बेटी के पति हैं, घर के सदस्य हैं, जिनसे शिकायत भी की जाती है और सिर-आँखों पर भी बिठाया जाता है.
-गौतम
ये लेख सतत् छत्तीसगढ़ पत्रिका से ली गई है…