Nitish Kumar political journey : जानकार अक्सर इस बात को लेकर सहमत हो जाते हैं कि बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का नाम सिर्फ एक नेता का नाम नहीं, बल्कि एक राजनीतिक युग की पहचान है. आधी सदी से ज़्यादा अपने इस लंबे राजनीतिक सफर में नीतीश ने हार, हताशा, संघर्ष, सत्ता, गठबंधन, बगावत और वापसी सबका सामना किया और अब 2025 में वह दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे हैं. यह सिर्फ एक रिकॉर्ड नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति के उस किरदार की सबसे रोचक और जटिल यात्राओं की कहानी है.
राजनीति में नीतीश की एंट्री
1951 में बिहार के बख्तियारपुर में जन्मे नीतीश कुमार का बचपन किसी सियासी माहौल में नहीं बीता. पिता आयुर्वेदिक चिकित्सक थे और मां एक साधारण गृहिणी. नीतीश की आरंभिक शिक्षा स्थानीय स्कूलों में हुई. हाई स्कूल में उत्कृष्ट प्रदर्शन के बाद उन्होंने पटना इंजीनियरिंग कॉलेज से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की, लेकिन इंजीनियर बनने का रास्ता जल्द ही बदल गया. 1970 के दशक की अशांत राजनीति जैसे कि जेपी आंदोलन, आपातकाल और छात्र राजनीति की उथल-पुथल ने उन्हें राजनीति की ओर खींच लिया.
पहली चुनावी हार और फिर जीत का स्वाद
बिहार के राजनीति का यह अनसुलझा किरदार जब पहली बार 1977 में हरनौत विधानसभा सीट से जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा तो हार मिली जो सिलसिला 1980 में भी जारी है मतलब की नीतीश 1980 में भी हार गए. कहा जाता है कि 1985 के चुनाव में उन्होंने अपनी पत्नी मंजू स्नेहा से कहा था कि अगर इस बार हार गए तो राजनीति छोड़ देंगे. पत्नी ने उन्हें चुनाव खर्च के लिए 20 हजार रुपये दिए और इस बार नीतीश जीत गए. यही जीत उनकी राजनीतिक पुनर्जन्म थी. फिर 1989 में वे पहली बार लोकसभा पहुंचे. वीपी सिंह सरकार में युवा चेहरे के रूप में उनकी पहचान बनी. 1990 के दशक में वे लालू प्रसाद यादव के सहयोगी भी बने और विरोधी भी. इन्हीं वर्षों में नीतीश ने अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनानी शुरू की .
संघर्ष और सीएम पद तक का रास्ता
एक ऐसा नेता जिसे भ्रष्टाचार से समझौता पसंद नहीं और न ही राजनीतिक स्थिरता से डर था. नीतीश अपने इस पहचान को साथ लिए 1994 में उन्होंने जॉर्ज फर्नांडीस के साथ मिलकर समता पार्टी बनाई. 1995 में चुनाव लड़े और सिर्फ 7 सीटें आईं लेकिन नीतीश की राजनीतिक पकड़ मजबूत होती गई. इसके बाद 2000 में वे पहली बार मुख्यमंत्री बने लेकिन सिर्फ 7 दिन के लिए. बहुमत साबित नहीं कर सके तो इस्तीफा देना पड़ा. यही वह मोड़ था जिसने नीतीश की राजनीति में धैर्य और रणनीति को नई जगह दी. नीतीश अब राजनीति अपने तौर तरिकों को समझ चुके थे जिसका नतीजा हुआ कि 2005 के नवंबर चुनावों ने बिहार की राजनीति की दिशा बदल दी. एनडीए बहुमत में आई और नीतीश कुमार ने एक स्थायी मुख्यमंत्री के रूप में कदम रखा. 2005 से 2010 का कार्यकाल बिहार की कानून-व्यवस्था और विकास की दिशा में एक निर्णायक मोड़ माना जाता है. सड़कें, शिक्षा योजनाएँ, महिला सशक्तिकरण और भ्रष्टाचार पर कार्रवाई,इन सबने नीतीश को एक मजबूत प्रशासक की छवि दी. जिसका नतीजा 2010 के चुनाव में देखने को मिला जब जेडीयू को 115 सीटें मिलीं.
भाजपा से दूरी और राजनीतिक उथल-पुथल
अब तक नीतीश की पहचान राजनीति के उस मजबूत पिलर की तरह हो गया था जिसपर पूरा का पूरा मकान खड़ा किया जा सकता था और बड़े महत्वाकांझा की चाहत मे 2013 में नरेंद्र मोदी के उभार के कारण नीतीश का रास्ता भाजपा से अलग कर दिया. उन्होंने 13 साल के रिस्तों को दरकिनार कर NDA से नाता तोड़ दिया और विश्वास मत में अपनी सरकार बचाई, हालांकि 2014 के लोकसभा चुनाव में जेडीयू की करारी हार के बाद उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. लेकिन राजनीति में नीतीश कभी लंबे समय तक हाशिये पर नहीं रहे और राजनीतिक प्रयोग करते रहते. 2015 उनका महागठबंधन वाला प्रयोग सफल हुआ और उनकी सत्ता में शानदार वापसी हुई .2015 में नीतीश ने लालू यादव की आरजेडी और कांग्रेस के साथ मिलकर महागठबंधन बनाया. चुनाव में भारी जीत मिली. नीतीश फिर से मुख्यमंत्री बने. लेकिन यह प्रयोग ज्यादा दिन नहीं चला. 2017 में उन्होंने महागठबंधन छोड़कर एक बार फिर भाजपा का दामन थाम लिया, सियासी विश्लेषकों ने इसे U-टर्न की राजनीति कहा, लेकिन नीतीश ने इसे जनहित का निर्णय बताया. 2020 के चुनाव में जेडीयू ने 115 से गिरकर सिर्फ 43 सीटें पाईं, लेकिन भाजपा ने उन्हें सीएम बनाए रखा. 2022 में एक बार फिर नीतीश ने भाजपा से नाता तोड़ा और महागठबंधन में शामिल हो गए. लेकिन महागठबंधन भी ज्यादा समय तक टिक नहीं पाया और 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले वे फिर NDA में लौट आए. यह नीतीश कुमार की राजनीति का सबसे बड़ा पैटर्न रहा कि वे हर गठबंधन को अपनी शर्तों पर साधते रहे.
10वीं बार मुख्यमंत्री बन बनाया भारत का बेजोड रिकॉर्ड
2025 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू ने 85 सीटें जीतकर मजबूत प्रदर्शन किया. एनडीए ने बहुमत की सरकार तय की. नीतीश को फिर से विधायक दल का नेता चुना गया. अब वे 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं,भारत में ऐसा रिकॉर्ड किसी और मुख्यमंत्री के नाम नहीं है. यह उपलब्धि न सिर्फ राजनीतिक कौशल का प्रमाण है, बल्कि यह दर्शाती है कि बिहार की जनता आज भी नीतीश के प्रशासनिक अनुभव और स्थिर नेतृत्व पर भरोसा करती है. लेकिन इस सफलता के साथ साथ कई सवाल भी है जो नीतीश कुमार से है. जैसे कि क्यों नीतीश अब भी इतने प्रभावशाली हैं? इसके पीछे कई तर्क है. अब देखें तो भारत में गठबंधन की राजनीति अक्सर स्थिरता नहीं, बल्कि समझौते की राजनीति होती है. और नीतीश इस कला के उस्ताद हैं कभी भाजपा तो कभी लालू उन्होंने हर राजनीतिक स्पेस का उपयोग किया. अपने शासन में ब्रांड नीतीश के तौर पर जनता का भरोसा जीतने के लिए उन्होंने शराबबंदी, सड़क-स्कूल-सुरक्षा, महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की नीति और पंचायत स्तर पर न्यायिक सुधार के जरिए अपनी विकासपुरुष की छवि बनाई. बिहार में राजनीतिक नेतृत्व अक्सर जातीय समीकरणों में उलझा रहा है. नीतीश इस समीकरण को संतुलित और नियंत्रित रखने में माहिर रहे हैं. उन्होंने महिला वोटों के सहारे इसका तोड़ निकाला.
क्या टिकेगा नीतीश मॉडल ?
अब नीतीश के सामने सबसे बड़े सवाल ये हैं कि 2025 के बाद की राजनीति उन्हें किस दिशा में ले जाएगी? क्या वे भाजपा के साथ लंबे समय तक संबंध बनाए रख पाएँगे? क्या उत्तराधिकार का मुद्दा जेडीयू में उभरेगा? और क्या बिहार में विकास की गति उनकी उम्र के साथ धीमी तो नहीं हो जाएगी? इन सवालों के बीच, एक बात साफ है कि नीतीश कुमार भारतीय राजनीति की उन दुर्लभ हस्तियों में हैं, जिन्होंने अपने राजनीतिक कौशल, प्रशासनिक क्षमता और रणनीति से खुद को बार-बार स्थापित किया है. दसवीं बार मुख्यमंत्री बनना न सिर्फ एक उपलब्धि है, बल्कि राजनीतिक इतिहास का वो हिस्सा है जहाँ नीतीश कुमार का अध्याय अभी बाकी है.